रत्न कहाँ से पैदा हुए ?

हम सब ने आस-पास किसी न किसी को हाथ में या फिर गर्दन में रत्न धारण किए हुए बहुत से लोगों को देखा होगा। पर हमें आज तक यह पता नहीं चल पाया के असल में इन सभी रत्नो की उत्पति कहाँ से हुई, तो चलिए जानते हैं कि रत्न कहाँ से पैदा हुए ……

महर्षि दघीचि की अस्थियों से रत्न प्राप्ति की कथा

अग्नि पुराण से मिली कथा के अनुसार पूर्व समय में वृतासुर नामक दानव ने देवलोकों पर आक्रमण कर सभी देवी देवताओं को पराजित कर दिया यहाँ तक उससे इंद्र देव भी परास्त हो गए थे। उस समय पे भगवन विष्णु जी ने इंद्र देव को यह मशवरा दिया कि हड्डी से यदि किसी अस्त्र का निर्माण किया जाये तो उस अस्त्र द्वारा वृतासुर का वध हो सकता है।
भगवन विष्णु की कहने के अनुसार सभी देवताओं सहित इंद्र देव महर्षि दघीचि के पास गये ओर उन्हें अपना दुःख बताया। महर्षि दघीचि ने इस प्रस्ताव को खुश हो कर स्वीकार किया। तत्पश्चात उनके शरीर को नमक लगाकर गाय से चटवाया गया। इसके बाद जो हड्डियां प्राप्त हुई उनसे इंद्र देव ने ‘वज्र’ नामक महास्त्र का निर्माण किया। इस के प्रहार से वृतासुर मारा गया और देव गण अपने अपने लोक में चले गये।
लोकोपकारी महात्मा दघीचि की अस्थियों से जिस समय “वज्र” का निर्माण किया जा रहा था उस समय उन अस्थियों के जो सूक्षम कण “धरा” पर गिरे, उनसे हीरे की खानें उत्पन हुई तथा अन्य रत्नों के खान भी बने। इस तरह  इस कथा से पता चलता है कि रत्न कहाँ से पैदा हुए।

राजा बलि कि शरीर से रत्न प्राप्ति कथा

कुछ पुराणों के मतानुसार दैत्य राजा बलि का वध करने के लिए भगवान त्रिलोकी नाथ श्री विष्णु ने वामन अवतार धारण किया था और उसके दर्प को चूर किया था। इस समय विष्णु जी के चरण स्पर्श से दैत्यराज बलि का सारा शरीर रत्नों का बन गया। तब देवराज इंद्र ने इस पर वज्र की चोट की। इस प्रकार टूटकर बिखरे हुए बलि के रत्नमय खण्डों को भगवान शिव जी ने अपने त्रिशूल पर धारण कर लिया और उस में नवग्रह और बारह राशियों के प्रभुत्व का आधार करके पृथ्वी पर गिरा दिया।

पृथ्वी पर गिराये गये इन खण्डों से ही विभिन्य रत्नों की खानें पृथ्वी के गर्भ में बन गयी। कहते है कि राजा बलि कि शरीर के विभिन्न अंगों से 84 प्रकार के रत्न और मणियों की उत्पति हुई। जैसे  कि….

रक्त से माणिक्य, मन से मोती, पित्त से पन्ना, माँस से पुखराज, मस्तक से हीरा, आँखों से नीलम, त्वचा से तैलमणि, वीर्य से अमृतमणि, काँरव से धृतमणि, यगोपवीत से लहसुनिया, मेद से गोमेद आदि। इस कथा के अनुसार रत्न कहाँ से पैदा हुए यह पता चलता है।

बलासुर नामक दैत्यों कि तन से रत्नों की उत्पत्ति कथा

गरुड़ पुराण के हिसाब से पूर्व काल में बलासुर नामक एक दानव ने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने की इच्छा से देवलोक पर आक्रमण कर दिया। बलासुर ने अपनी ताकत से देव लोक को जीत लिया था। बलासुर दैत्य होते हुए भी महदानी तथा अपने वचन का पक्का था। देवराज इंद्र ने उसके इसे गुण का फायदा उठा कर उसे ठगा और उसके विनाश का एक उपाए निकाला। इंद्र देव ब्राह्मण का वेश धारण कर बलासुर के सम्मुख भिक्षा मांगने के लिए गये और मांग की कि तुम हमारे यज्ञ में बलि का बकरा स्वीकार करो।

दैत्यराज बलासुर ने ब्राह्मण वेशधारी देवराज इंद्र की प्रार्थना को स्वीकार कर लिया। तब देवताओं ने उसका वध कर दिया। हवन दौरान  बलासुर का शरीर कि विभिन्न अंग धरती पर यहा-यहा गिरे वहाँ पर रत्नों की खानें बन गयी। इस कथा के अनुसार रत्न कहाँ से पैदा हुए यह पता चलता है।

समुद्र मंथन से रत्न उत्पत्ति कथा

यह कथा भी पुराणों में वर्णित है- कि देवता और दैत्यों ने मंदराचल की मथनी तथा नागराज बासुकी को रज्जु बनाकर समुद्र का मंथन किया था तो 14 रत्न पदार्थ निकले। मंथन में से “कौस्तुब” नामक मणि भी प्रकट हुई जिसे भगवान विष्णु जी ने अपने कंठ में धारण कर लिया।

फिर इससे निकले “अमृत” को लेकर देव दानवो में काफी संघर्ष हुआ। स्वर्ण कलश लेकर असुर भाग निकले और देवताओं ने उनका पीछा किया। देवताओं और दानवों  के बीच में छीना झपटी हुई। इसी छीना झपटी के दौरान अमृत कलश से अमृत की बूंदे धरती पर यहाँ-यहाँ गिरी वहाँ पर रत्नों की उत्पत्ति हुई।

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